देश में भीषण गर्मी और बिजली की लगातार बढ़ती खपत के बीच एक गंभीर ऊर्जा संकट की आहट मिलने लगी है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत के लगभग 40 प्रतिशत कोयला आधारित पावर प्लांट्स में ईंधन का स्टॉक बेहद निचले स्तर पर पहुंच गया है।
आंकड़ों के मुताबिक, 19 सितंबर तक ऐसे पावर प्लांट्स की संख्या बढ़कर 74 हो गई है, जिनके पास अपनी आवश्यकता का 25 प्रतिशत से भी कम कोयला या फिर महज सात दिनों से कम समय का ईंधन बचा है। महज एक हफ्ते पहले ऐसे प्लांट्स की संख्या 60 दर्ज की गई थी, जो स्थिति के तेजी से बिगड़ने की ओर इशारा करती है।
रिकॉर्ड तोड़ मांग और लॉजिस्टिक्स की चुनौतियां
हाल के दिनों में देश भर में बिजली की मांग में भारी उछाल देखा गया है। पिछले हफ्ते के दौरान बिजली की पीक डिमांड 230 गीगावाट से 250 गीगावाट के बीच दर्ज की गई, जबकि इस साल मई के महीने में यह ऑल-टाइम हाई 270.70 गीगावाट तक पहुंच गई थी।
एक तरफ पावर कंपनियों के सामने बिजली की मांग को पूरा करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ अनियमित मॉनसून की बारिश के कारण कोयले के परिवहन और लॉजिस्टिक्स में रुकावटें आ रही हैं।
हालांकि, कोयला और रेल मंत्रालयों ने सप्लाई में सुधार लाने के लिए कदम उठाए हैं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति कोयले की स्थाई कमी नहीं, बल्कि एक अस्थाई लॉजिस्टिक्स चुनौती है, जिसमें डिलीवरी सामान्य होते ही सुधार संभव है।
रिन्यूएबल एनर्जी की सीमाएं और कोयले का रिकॉर्ड आयात
भले ही अप्रैल से अगस्त के दौरान देश में रिन्यूएबल ऊर्जा उत्पादन में लगभग 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन चौबीसों घंटे निर्बाध बिजली सप्लाई के लिए कोयला आधारित संयंत्रों पर निर्भरता बनी हुई है। सौर और पवन ऊर्जा मौसम पर आधारित होने के कारण लगातार एक समान बिजली नहीं दे सकते।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त में भारत का कोयला आयात 15 महीने के रिकॉर्ड उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। आने वाले हफ्तों में घरेलू कोयले की डिलीवरी की रफ्तार और जल-विद्युत उत्पादन में सुधार ही देश को इस संभावित संकट से निकालने में मुख्य भूमिका निभाएंगे।









